गृह प्रवेश मुहूर्त
गृह प्रवेश मुहूर्त नए घर में प्रवेश का द्योतक है। यह शुभ मासों, नक्षत्रों व तिथियों से चुना जाता है, अशुभ काल को टालकर।
शुभ काल
शुभ मास माघ, फाल्गुन, वैशाख व ज्येष्ठ हैं। शुभ नक्षत्रों में रोहिणी, मृगशिरा, उत्तराफाल्गुनी, उत्तराषाढ़ा, उत्तराभाद्रपदा, चित्रा, अनुराधा व रेवती हैं।
त्यागने योग्य काल
गृह प्रवेश चातुर्मास, अधिक मास (मलमास), तथा अमावस्या व रिक्ता तिथियों (चतुर्थी, नवमी, चतुर्दशी) में टाला जाता है।
महत्वपूर्ण: यह सामान्य मार्गदर्शन है, व्यक्तिगत मुहूर्त नहीं। अंतिम तिथि संबंधित कुंडलियों को देखते हुए योग्य पंडित द्वारा निश्चित की जानी चाहिए। किसी संभावित तिथि पर चौघड़िया व राहु काल जाँचने हेतु मुहूर्त प्लानर का उपयोग करें।
गृह प्रवेश मुहूर्त क्या है
नए घर में पहली बार प्रवेश करना — गृह प्रवेश — हिंदू परंपरा में एक महत्वपूर्ण संस्कार है, जो घर में सुख, समृद्धि व शांति के आगमन का प्रतीक है। इसका मुहूर्त सावधानी से चुना जाता है, ताकि नया जीवन-अध्याय एक शुभ, मंगल आरंभ के साथ प्रारंभ हो। गृह प्रवेश तीन प्रकार का होता है — अपूर्व (बिल्कुल नए घर में पहली बार), सपूर्व (यात्रा या प्रवास के बाद अपने घर में वापसी) व द्वंद्व (मरम्मत, नवीनीकरण या किसी अशुभ घटना के बाद पुनः प्रवेश)। हर प्रकार का अपना विचार है, पर सभी में शुभ मास, नक्षत्र, तिथि व लग्न देखे जाते हैं। यह पृष्ठ गृह प्रवेश मुहूर्त के प्रमुख विचारों का परिचय देता है।
गृह प्रवेश के शुभ मास
गृह प्रवेश के लिए कुछ चंद्र मास विशेष शुभ माने जाते हैं — विशेषकर माघ, फाल्गुन, वैशाख व ज्येष्ठ। इनके विपरीत, विवाह की भाँति, चातुर्मास (जब विष्णु शयन करते हैं, आषाढ़ से कार्तिक), अधिक मास (मलमास) व धनुर्मास/खरमास गृह प्रवेश हेतु टाले जाते हैं। आषाढ़, श्रावण, भाद्रपद व आश्विन के अधिकांश भाग भी सामान्यतः टाले जाते हैं। इसीलिए गृह प्रवेश प्रायः वसंत (माघ-फाल्गुन-वैशाख) व ग्रीष्म के आरंभ में केंद्रित होते हैं, जब मास शुभ होता है। शुभ मास चुनना गृह प्रवेश मुहूर्त का प्रथम चरण है।
शुभ नक्षत्र और तिथियाँ
गृह प्रवेश हेतु शुभ नक्षत्रों में रोहिणी, मृगशिरा, उत्तराफाल्गुनी, उत्तराषाढ़ा, उत्तराभाद्रपदा, चित्रा, अनुराधा, स्वाति व रेवती प्रमुख हैं — ये स्थायित्व, शांति व समृद्धि से जुड़े माने जाते हैं। तिथियों में द्वितीया, तृतीया, पंचमी, सप्तमी, दशमी, एकादशी, त्रयोदशी व पूर्णिमा शुभ मानी जाती हैं, जबकि रिक्ता तिथियाँ (चतुर्थी, नवमी, चतुर्दशी), अमावस्या व प्रतिपदा टाली जाती हैं। वार में सोमवार, बुधवार, गुरुवार व शुक्रवार अनुकूल हैं; मंगल व शनि सामान्यतः टाले जाते हैं। इन सबका मेल एक शुभ गृह प्रवेश-दिवस बनाता है।
वास्तु और दिशा
गृह प्रवेश में मुहूर्त के साथ वास्तु का भी विचार होता है — घर का मुख्य द्वार, पूजा-स्थान की दिशा, व प्रवेश की दिशा शुभ मानी जानी चाहिए। परंपरा में मुख्य द्वार से प्रवेश करते समय दाहिना पैर पहले रखना, कलश व नारियल सहित प्रवेश करना, व घर में सर्वप्रथम पूजा-स्थान स्थापित करना शुभ माना जाता है। कई परिवार प्रवेश के समय दूध उबालकर उसके उफनने को समृद्धि का शुभ संकेत मानते हैं। वास्तु व मुहूर्त दोनों का मेल नए घर को एक शुभ, संतुलित व सकारात्मक ऊर्जा देता है। वास्तु के सूक्ष्म विचार के लिए विशेषज्ञ से परामर्श उपयोगी है।
त्यागने योग्य काल
शुभ गृह प्रवेश-तिथि चुनते समय चातुर्मास, अधिक मास व धनुर्मास तो टाले ही जाते हैं; साथ ही अमावस्या, रिक्ता तिथियाँ, व भद्रा (विष्टि करण) व पंचक जैसे काल भी सूक्ष्मता से देखे जाते हैं। नए घर में प्रवेश एक "नई शुरुआत" है, अतः इसे राहु काल, यमगंड व गुलिक जैसे दैनिक अशुभ खंडों के बाहर, शुभ चौघड़िया या लग्न में किया जाता है। कुछ परंपराओं में सूर्य के उत्तरायण (मकर संक्रांति के बाद) को गृह प्रवेश हेतु अधिक शुभ माना जाता है। इन सबका ध्यान रखकर एक ऐसा शुभ क्षण चुना जाता है जो नए घर में मंगल का वास सुनिश्चित करे।
गृह प्रवेश के अनुष्ठान
गृह प्रवेश केवल एक तिथि नहीं, बल्कि एक पूर्ण अनुष्ठान है। प्रायः इसमें गणेश पूजा (विघ्न-निवारण हेतु), वास्तु पूजा (घर की ऊर्जा को शुद्ध व संतुलित करने हेतु), नवग्रह शांति, व कलश-स्थापना सम्मिलित होती है। कई परिवार हवन व सत्यनारायण कथा भी करते हैं। प्रवेश शुभ लग्न व चौघड़िया में, कुल-देवता व लक्ष्मी के आवाहन के साथ किया जाता है। इन अनुष्ठानों का उद्देश्य नए घर को शुद्ध करना, नकारात्मक ऊर्जा को दूर करना, व देवताओं का आशीर्वाद प्राप्त करना है, ताकि परिवार वहाँ सुख-शांति से रहे।
पंडित से पुष्टि क्यों आवश्यक है
गृह प्रवेश मुहूर्त के सभी विचार — मास, नक्षत्र, तिथि, लग्न, वास्तु व परिवार की कुंडली — परस्पर जुड़े व सूक्ष्म हैं, अतः इनका समग्र निर्णय योग्य पंडित द्वारा लिया जाना चाहिए। यह पृष्ठ एक सामान्य मार्गदर्शन है, व्यक्तिगत मुहूर्त नहीं। किसी संभावित गृह प्रवेश-तिथि को अंतिम रूप देने से पूर्व पंडित से पुष्टि अवश्य करें। किसी शॉर्टलिस्ट की गई तिथि पर चौघड़िया व राहु काल जाँचने के लिए मुहूर्त प्लानर का उपयोग करें, व शुभ नक्षत्रों के लिए 27 नक्षत्र देखें।
गृह प्रवेश की क्षेत्रीय परंपराएँ
गृह प्रवेश की परंपराएँ क्षेत्र अनुसार भिन्न हैं। उत्तर भारत में कलश-यात्रा, दूध उबालना व नारियल फोड़ना प्रमुख रस्में हैं। दक्षिण भारत में "गृहप्रवेशम्" में विस्तृत वास्तु पूजा, गौ-प्रवेश (गाय को पहले घर में प्रवेश कराना) व पायसम बनाना सम्मिलित है। महाराष्ट्र में "वास्तुशांती" पूजा प्रमुख है। बंगाल व अन्य क्षेत्रों की भी अपनी विशिष्ट रस्में हैं। इन विविधताओं के बीच मूल भावना समान है — नए घर को शुद्ध करना, देवताओं व पूर्वजों का आशीर्वाद प्राप्त करना, व घर में समृद्धि व शांति का आवाहन करना। अपनी क्षेत्रीय परंपरा के अनुसार पंडित से मुहूर्त व अनुष्ठान निश्चित करना सदा उत्तम है।
प्रवेश से पूर्व घर की तैयारी
गृह प्रवेश से पूर्व घर की तैयारी भी परंपरा का अंग है। घर की सफ़ाई व शुद्धि की जाती है, मुख्य द्वार को तोरण, आम-पत्तों की माला व रंगोली से सजाया जाता है, व पूजा-स्थान की व्यवस्था की जाती है। कई परिवार प्रवेश से पूर्व घर में गंगाजल का छिड़काव या हवन कर वातावरण को शुद्ध करते हैं। मुख्य द्वार पर स्वस्तिक व शुभ-लाभ के चिह्न बनाना शुभ माना जाता है। यह तैयारी केवल सजावट नहीं, बल्कि नए घर में शुभ व सकारात्मक ऊर्जा का स्वागत है। शुभ मुहूर्त में, इस तैयार घर में, परिवार पहली बार मंगल-भाव से प्रवेश करता है।
वास्तु विचार और उपाय
गृह प्रवेश में वास्तु का विचार केंद्रीय है। मुख्य द्वार की दिशा, पूजा-स्थान (ईशान/उत्तर-पूर्व शुभ माना जाता है), रसोई (आग्नेय/दक्षिण-पूर्व), व शयन-कक्ष की दिशा शुभ मानी जानी चाहिए। यदि घर में कोई वास्तु-दोष हो, तो परंपरा में कुछ उपाय बताए गए हैं — जैसे वास्तु पूजा, पिरामिड या यंत्र की स्थापना, या दर्पण व रंगों का उपयोग। ये उपाय दोष के प्रभाव को संतुलित करने हेतु किए जाते हैं। वास्तु के सूक्ष्म विचार व उपायों के लिए विशेषज्ञ वास्तु-सलाहकार से परामर्श उपयोगी है, ताकि नया घर संतुलित व सकारात्मक ऊर्जा से भरा रहे।
नया घर, किराये का घर व नवीनीकरण के बाद
गृह प्रवेश का प्रकार स्थिति के अनुसार बदलता है। बिल्कुल नए घर में पहली बार प्रवेश (अपूर्व) के लिए पूर्ण अनुष्ठान किया जाता है। किराये के घर में प्रवेश के लिए एक सरल पूजा प्रायः पर्याप्त मानी जाती है, क्योंकि यह स्थायी निवास नहीं। मरम्मत, नवीनीकरण या किसी अशुभ घटना के बाद पुनः प्रवेश (द्वंद्व) के लिए विशेष शुद्धि-पूजा की जाती है। हर स्थिति में मूल सिद्धांत यही है — शुभ समय में, शुद्ध मन व शुभ संकल्प के साथ प्रवेश करना। अपनी विशिष्ट स्थिति के अनुसार उचित अनुष्ठान पंडित से निश्चित करें।
गृह प्रवेश के बारे में सामान्य प्रश्न
क्या किराये के घर के लिए भी गृह प्रवेश आवश्यक है? एक सरल पूजा प्रायः पर्याप्त मानी जाती है; पूर्ण अनुष्ठान मुख्यतः अपने स्थायी घर के लिए। क्या चातुर्मास में गृह प्रवेश हो सकता है? सामान्यतः टाला जाता है; अपरिहार्य हो तो पंडित से विशेष विचार कराएँ। क्या रात में गृह प्रवेश कर सकते हैं? दिन के शुभ लग्न व चौघड़िया को वरीयता दी जाती है; रात्रि-प्रवेश सामान्यतः टाला जाता है। क्या वास्तु-दोष वाले घर में प्रवेश कर सकते हैं? हाँ, वास्तु पूजा व उपायों के साथ; गंभीर दोष हेतु विशेषज्ञ से परामर्श करें। अंतिम गृह प्रवेश मुहूर्त सदा योग्य पंडित से निश्चित करें।
हिंदू परंपरा में घर का महत्व
हिंदू परंपरा में घर केवल एक भवन नहीं, बल्कि परिवार के जीवन, संस्कृति व आध्यात्मिकता का केंद्र है। इसे "गृह-लक्ष्मी" का निवास माना जाता है, जहाँ देवता, पूर्वज व परिवार साथ रहते हैं। घर का पूजा-स्थान परिवार की आध्यात्मिक धुरी है, व रसोई (अन्नपूर्णा का स्थान) पोषण का केंद्र। यही कारण है कि नए घर में प्रवेश को केवल स्थान-परिवर्तन नहीं, बल्कि एक पवित्र, मंगल आरंभ माना जाता है — एक ऐसा क्षण जब परिवार अपने नए जीवन-अध्याय में देवताओं के आशीर्वाद के साथ प्रवेश करता है। गृह प्रवेश मुहूर्त इसी शुभ आरंभ को सुनिश्चित करता है, ताकि घर सुख, समृद्धि व शांति से भरा रहे।
कलश, गौ और पहला भोजन
गृह प्रवेश की रस्मों में कई सुंदर प्रतीक हैं। कलश (जल से भरा, आम-पत्ते व नारियल सहित) समृद्धि व मंगल का प्रतीक है, जिसे लेकर गृहस्वामी या गृहिणी सर्वप्रथम प्रवेश करते हैं। दक्षिण भारत में गौ-प्रवेश — गाय को पहले घर में प्रवेश कराना — अत्यंत शुभ माना जाता है, क्योंकि गाय स्वयं लक्ष्मी व पवित्रता का प्रतीक है। नए घर में पहला भोजन प्रायः दूध व चावल (खीर/पायसम) से बनाया जाता है, व दूध उबालकर उसके उफनने को समृद्धि का शुभ संकेत माना जाता है। ये सभी रस्में नए घर में शुभता, पोषण व समृद्धि का आवाहन करती हैं।
अपार्टमेंट व आधुनिक घरों में गृह प्रवेश
आज अधिकांश शहरी परिवार अपार्टमेंट या फ्लैट में रहते हैं, व गृह प्रवेश की परंपरा वहाँ भी सहजता से निभाई जा सकती है। मूल सिद्धांत वही रहते हैं — शुभ मुहूर्त, वास्तु का विचार (यहाँ तक कि एक फ्लैट में भी मुख्य द्वार व पूजा-स्थान की दिशा देखी जा सकती है), व शुद्धि-पूजा। कई परिवार अपार्टमेंट में एक सरल पर श्रद्धापूर्ण गृह प्रवेश करते हैं, जिसमें गणेश व वास्तु पूजा, कलश-प्रवेश व दूध उबालना सम्मिलित होता है। इस प्रकार यह प्राचीन परंपरा आधुनिक शहरी जीवन में भी उतनी ही प्रासंगिक व सुंदर बनी रहती है।
नए घर में शुभ प्रथम कर्म
गृह प्रवेश के बाद, नए घर में कुछ शुभ प्रथम कर्म किए जाते हैं। पूजा-स्थान की स्थापना व प्रथम पूजा सर्वप्रथम की जाती है। रसोई में पहला भोजन (प्रायः खीर या मीठा) बनाया जाता है, जो पोषण व समृद्धि का प्रतीक है। कई परिवार गृह प्रवेश के दिन या उसके पश्चात सत्यनारायण कथा व हवन करते हैं, व मित्रों-परिजनों को भोज पर आमंत्रित करते हैं। परंपरा में गृह प्रवेश के कुछ दिनों तक घर को खाली न छोड़ना शुभ माना जाता है। ये सभी कर्म नए घर में जीवन के शुभ आरंभ को व्यक्त करते हैं।
संक्षेप में
गृह प्रवेश मुहूर्त शुभ मास, नक्षत्र, तिथि, लग्न व वास्तु के मेल से चुना जाता है, ताकि नए घर में मंगल का वास हो। यह पृष्ठ इसके प्रमुख विचारों का परिचय देता है, पर यह एक सामान्य मार्गदर्शन है — अंतिम मुहूर्त व अनुष्ठान योग्य पंडित से निश्चित करें। किसी संभावित तिथि का चौघड़िया व राहु काल मुहूर्त प्लानर से जाँचें, शुभ नक्षत्रों के लिए 27 नक्षत्र देखें, व मूल सिद्धांत के लिए पंचांग गाइड पढ़ें।
वास्तु शांति पूजा विस्तार से
गृह प्रवेश का हृदय वास्तु शांति पूजा है — एक अनुष्ठान जो नए घर की ऊर्जा को शुद्ध, संतुलित व शुभ बनाता है। इसमें सर्वप्रथम गणेश पूजा (विघ्न-निवारण), फिर कलश-स्थापना व नवग्रह पूजा (नौ ग्रहों की शांति हेतु) की जाती है। वास्तु पुरुष (भवन के अधिष्ठाता देव) का आवाहन कर उन्हें प्रसन्न किया जाता है, ताकि घर में रहने वाले सुख-शांति से रहें। कई परंपराओं में हवन किया जाता है, जिसमें विशेष मंत्रों से आहुति दी जाती है। पूजा के अंत में प्रसाद वितरण व भोज होता है। यह पूजा नए घर को न केवल धार्मिक दृष्टि से शुद्ध करती है, बल्कि परिवार को एक सामूहिक, मंगल आरंभ का अनुभव भी देती है।
गृहप्रवेश के उपहार व अतिथि
गृह प्रवेश एक सामाजिक उत्सव भी है, जिसमें मित्रों व परिजनों को आमंत्रित किया जाता है। अतिथि प्रायः नए घर के लिए शुभ उपहार लाते हैं — जैसे लक्ष्मी-गणेश की मूर्ति, पूजा-सामग्री, पौधे, दीप, या घरेलू उपयोग की वस्तुएँ। परंपरा में नए घर में मिठाई, नमक व अन्न लाना शुभ माना जाता है, जो समृद्धि व पोषण का प्रतीक है। मेज़बान अतिथियों को भोज पर आमंत्रित करते हैं, जिससे नया घर हँसी, आशीर्वाद व सामूहिक शुभ-कामनाओं से भर जाता है। यह सामाजिक पक्ष गृह प्रवेश को केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि एक आनंदमय पारिवारिक उत्सव बना देता है।
जब गृह प्रवेश विलंबित हो
कभी-कभी परिस्थितियों के कारण शुभ मुहूर्त में गृह प्रवेश संभव नहीं होता — जैसे घर का निर्माण अधूरा हो, या शुभ मास न चल रहा हो। ऐसी स्थिति में परंपरा में कुछ विकल्प हैं: कुछ परिवार एक सरल प्रतीकात्मक प्रवेश (जैसे पूजा-स्थान की स्थापना व एक दीप जलाना) शुभ मुहूर्त में कर लेते हैं, व पूर्ण गृह प्रवेश बाद में शुभ मास में करते हैं। महत्वपूर्ण यह है कि नए घर में स्थायी निवास एक शुभ क्षण में आरंभ हो। अपनी विशिष्ट स्थिति के लिए उचित विकल्प पंडित से निश्चित करें, जो आपके घर व परिवार की स्थिति को देखकर मार्गदर्शन दे सके।
गृह प्रवेश — एक सारांश चेक-लिस्ट
गृह प्रवेश मुहूर्त के मुख्य चरण संक्षेप में: (1) शुभ मास चुनें (माघ, फाल्गुन, वैशाख, ज्येष्ठ; चातुर्मास, अधिक मास व धनुर्मास टालें)। (2) शुभ नक्षत्र व तिथि देखें। (3) घर की वास्तु-दिशाएँ जाँचें व आवश्यक हो तो उपाय करें। (4) उस दिन शुभ लग्न व चौघड़िया में प्रवेश करें, राहु काल से बचते हुए। (5) गणेश व वास्तु पूजा, कलश-प्रवेश व प्रथम भोजन की व्यवस्था करें। (6) अंतिम मुहूर्त व अनुष्ठान योग्य पंडित से निश्चित करें। इस प्रकार गृह प्रवेश एक सुविचारित, शुभ आरंभ बन जाता है, जो नए घर में सुख-समृद्धि का वास सुनिश्चित करता है।
वास्तु और मुहूर्त — एक साथ
गृह प्रवेश में वास्तु व मुहूर्त दोनों साथ चलते हैं, क्योंकि दोनों का उद्देश्य एक ही है — नए घर में शुभ, संतुलित व सकारात्मक ऊर्जा का वास। वास्तु घर की दिशाओं व संरचना को देखता है, जबकि मुहूर्त प्रवेश के शुभ समय को। यदि घर की वास्तु-दिशाएँ अनुकूल हों व प्रवेश शुभ मुहूर्त में हो, तो परंपरा मानती है कि घर सुख-समृद्धि से भरा रहता है। इसीलिए गृह प्रवेश की योजना बनाते समय दोनों का विचार किया जाता है। घर की वास्तु-दिशाओं के लिए विशेषज्ञ से, व शुभ मुहूर्त के लिए योग्य पंडित से परामर्श करें। किसी संभावित तिथि का चौघड़िया व राहु काल मुहूर्त प्लानर से जाँचें।
नए आरंभ का आशीर्वाद
अंततः, गृह प्रवेश एक नए जीवन-अध्याय के शुभ आरंभ का उत्सव है। एक नया घर केवल ईंट-पत्थर की संरचना नहीं, बल्कि परिवार के सपनों, स्मृतियों व भविष्य का आधार है। इसीलिए परंपरा इस आरंभ को इतनी श्रद्धा, पूजा व शुभ-संकल्प के साथ करती है। शुभ मुहूर्त में, देवताओं के आशीर्वाद के साथ, शुद्ध मन से किया गया प्रवेश नए घर को सुख, समृद्धि, स्वास्थ्य व शांति का निवास बनाता है। यही गृह प्रवेश संस्कार का गहनतम उद्देश्य है — नए घर में जीवन को एक मंगल, आशीर्वादपूर्ण आरंभ देना।
गृह प्रवेश के बाद के दिन
गृह प्रवेश के दिन के बाद भी कुछ परंपराएँ निभाई जाती हैं। कई परिवार प्रवेश के बाद कुछ दिनों तक घर में नित्य दीप जलाते व पूजा करते हैं, ताकि शुभ ऊर्जा स्थिर हो। पहले कुछ दिन घर को खाली न छोड़ना, व रात्रि में वहीं निवास करना शुभ माना जाता है। कुछ परंपराओं में गृह प्रवेश के बाद पहली पूर्णिमा या किसी शुभ तिथि पर सत्यनारायण कथा की जाती है। ये सभी कर्म नए घर में शुभ आरंभ को स्थायित्व देते हैं, व परिवार को वहाँ बसने का एक मंगल अनुभव देते हैं। इस प्रकार गृह प्रवेश केवल एक दिन का अनुष्ठान नहीं, बल्कि नए घर में जीवन के शुभ आरंभ की एक सुंदर प्रक्रिया है।
शुभ आरंभ, सुखद जीवन
गृह प्रवेश की परंपरा हमें सिखाती है कि हर महत्वपूर्ण आरंभ को श्रद्धा, विचार व शुभ-संकल्प के साथ करना चाहिए। नए घर में शुभ मुहूर्त में प्रवेश केवल एक रीति नहीं, बल्कि एक सकारात्मक मानसिकता का प्रतीक है — कि हम अपने नए जीवन-अध्याय को आशा, आशीर्वाद व मंगल-भाव से आरंभ करें। यही भावना घर को एक सुखद, शांतिपूर्ण निवास बनाती है। ऊपर वर्णित विचारों को समझकर व योग्य पंडित के मार्गदर्शन में, अपने नए घर के गृह प्रवेश को एक स्मरणीय व मंगल अवसर बनाएँ।
सामान्य प्रश्न
गृह प्रवेश मुहूर्त कैसे चुना जाता है?
गृह प्रवेश मुहूर्त नए घर में प्रवेश का द्योतक है। यह शुभ मासों, नक्षत्रों व तिथियों से चुना जाता है, अशुभ काल को टालकर।
क्या मैं कोई भी शुभ-सा दिन चुन सकता हूँ?
सामान्य मुहूर्त शुभ काल बताता है, किंतु विवाह व गृह प्रवेश के लिए परिवार की कुंडलियाँ व क्षेत्रीय परंपरा महत्वपूर्ण हैं। अंतिम मुहूर्त सदा योग्य पंडित से निश्चित करें।
कौन-से मास शुभ हैं?
शुभ मास माघ, फाल्गुन, वैशाख व ज्येष्ठ हैं। शुभ नक्षत्रों में रोहिणी, मृगशिरा, उत्तराफाल्गुनी, उत्तराषाढ़ा, उत्तराभाद्रपदा, चित्रा, अनुराधा व रेवती हैं।
कौन-से काल टाले जाते हैं?
गृह प्रवेश चातुर्मास, अधिक मास (मलमास), तथा अमावस्या व रिक्ता तिथियों (चतुर्थी, नवमी, चतुर्दशी) में टाला जाता है।
क्या पंडित आवश्यक है?
हाँ — यह पृष्ठ सामान्य मार्गदर्शन है; अंतिम मुहूर्त कुंडलियों व क्षेत्रीय परंपरा को देखते हुए योग्य पंडित से निश्चित करें।