विवाह मुहूर्त
विवाह मुहूर्त शुभ नक्षत्रों, तिथियों, वारों व मासों से चुना जाता है, अशुभ काल को टालकर। सटीक तिथियाँ वर-वधू की कुंडलियों पर निर्भर करती हैं।
शुभ काल
शुभ नक्षत्रों में रोहिणी, मृगशिरा, मघा, उत्तराफाल्गुनी, हस्त, स्वाति, अनुराधा, मूल, उत्तराषाढ़ा, उत्तराभाद्रपदा व रेवती हैं। शुभ तिथियाँ द्वितीया, तृतीया, पंचमी, सप्तमी, एकादशी व त्रयोदशी हैं।
त्यागने योग्य काल
विवाह चातुर्मास (जब विष्णु शयन करते हैं, लगभग आषाढ़ से कार्तिक) में, तथा जब गुरु या शुक्र अस्त हों, टाला जाता है।
महत्वपूर्ण: यह सामान्य मार्गदर्शन है, व्यक्तिगत मुहूर्त नहीं। अंतिम तिथि संबंधित कुंडलियों को देखते हुए योग्य पंडित द्वारा निश्चित की जानी चाहिए। किसी संभावित तिथि पर चौघड़िया व राहु काल जाँचने हेतु मुहूर्त प्लानर का उपयोग करें।
विवाह मुहूर्त क्या है
हिंदू परंपरा में विवाह सोलह संस्कारों में सर्वाधिक महत्वपूर्ण माना जाता है, और इसका मुहूर्त अत्यंत सावधानी से चुना जाता है। विवाह मुहूर्त वह शुभ समय है जब पंचांग के अनेक कारक — शुभ मास, नक्षत्र, तिथि, वार, योग व लग्न — अनुकूल हों, और वर-वधू की कुंडलियाँ भी परस्पर मिलती हों। मान्यता है कि शुभ मुहूर्त में संपन्न विवाह दंपति को दीर्घ, सुखी व समृद्ध वैवाहिक जीवन देता है, जबकि अशुभ काल में किया विवाह बाधाओं को आमंत्रित कर सकता है। यही कारण है कि विवाह की तिथि केवल सुविधा से नहीं, बल्कि शास्त्रीय गणना व योग्य पंडित के परामर्श से तय की जाती है। यह पृष्ठ विवाह मुहूर्त के प्रमुख विचारों का परिचय देता है, ताकि आप समझ सकें कि एक शुभ विवाह-तिथि कैसे चुनी जाती है।
विवाह के शुभ मास
विवाह के लिए कुछ चंद्र मास विशेष शुभ माने जाते हैं — विशेषकर माघ, फाल्गुन, वैशाख व ज्येष्ठ, तथा कार्तिक व मार्गशीर्ष के शुभ भाग। इनके विपरीत कुछ काल विवाह हेतु टाले जाते हैं। चातुर्मास — आषाढ़ शुक्ल एकादशी (देवशयनी) से कार्तिक शुक्ल एकादशी (देवुत्थानी) तक, जब भगवान विष्णु शयन करते हैं — विवाह हेतु वर्जित माना जाता है, और देवुत्थानी एकादशी के बाद ही विवाह-ऋतु पुनः आरंभ होती है। अधिक मास (मलमास) व धनुर्मास/खरमास (जब सूर्य धनु व मीन राशि में हो) भी विवाह हेतु टाले जाते हैं। इसीलिए विवाह के लिए पहले शुभ मास चुनना प्रथम चरण है, और यही कारण है कि भारत में विवाह प्रायः कुछ निश्चित ऋतुओं में केंद्रित होते हैं।
शुभ नक्षत्र और तिथियाँ
शुभ मास के भीतर, विवाह हेतु कुछ नक्षत्र विशेष उपयुक्त माने जाते हैं — रोहिणी, मृगशिरा, मघा, उत्तराफाल्गुनी, हस्त, स्वाति, अनुराधा, मूल, उत्तराषाढ़ा, उत्तराभाद्रपदा व रेवती। ये नक्षत्र स्थायित्व, प्रेम व सौभाग्य से जुड़े माने जाते हैं। तिथियों में द्वितीया, तृतीया, पंचमी, सप्तमी, एकादशी व त्रयोदशी शुभ मानी जाती हैं, जबकि रिक्ता तिथियाँ (चतुर्थी, नवमी, चतुर्दशी), अमावस्या व प्रतिपदा टाली जाती हैं। वार में सोमवार, बुधवार, गुरुवार व शुक्रवार अनुकूल हैं। इन सबका मेल एक शुभ विवाह-दिवस बनाता है, जिस पर आगे लग्न व मुहूर्त की सूक्ष्म गणना की जाती है।
गुण मिलान और कुंडली मिलान
विवाह मुहूर्त का एक केंद्रीय अंग वर-वधू की कुंडलियों का मिलान है, जिसे अष्टकूट गुण मिलान कहते हैं। इसमें दोनों के जन्म नक्षत्र व राशि को आठ कारकों (वर्ण, वश्य, तारा, योनि, ग्रह मैत्री, गण, भकूट, नाड़ी) पर परखा जाता है और 36 में से अंक दिए जाते हैं। सामान्यतः 18+ अंक स्वीकार्य, 24+ अच्छे व 32+ उत्तम माने जाते हैं। किंतु केवल अंक ही सब कुछ नहीं — नाड़ी दोष व भकूट दोष जैसे प्रमुख दोषों का परिहार भी आवश्यक है, और इनके निवारण के लिए कुछ योग भी होते हैं। यही कारण है कि मिलान केवल संख्या नहीं, बल्कि दोनों कुंडलियों का समग्र विश्लेषण है, जिसे योग्य ज्योतिषी ही ठीक से कर सकता है।
मंगल दोष (मांगलिक विचार)
विवाह-मिलान में मंगल दोष (मांगलिक योग) का विशेष विचार किया जाता है — यह तब बनता है जब मंगल कुंडली के कुछ विशेष भावों (1, 4, 7, 8, 12) में स्थित हो। मान्यता है कि मांगलिक व्यक्ति का विवाह दूसरे मांगलिक से करना चाहिए, ताकि दोष संतुलित हो जाए। कई परिहार-योग भी बताए गए हैं, और कुछ स्थितियों में दोष स्वतः निष्प्रभावी माना जाता है। यह एक सूक्ष्म व संवेदनशील विषय है, जिस पर विशेषज्ञ ज्योतिषी की राय आवश्यक है — इसे भय के बजाय एक सावधानीपूर्ण विचार के रूप में देखना चाहिए। यही कारण है कि विवाह मुहूर्त का निर्णय सदा दोनों कुंडलियों को देखते हुए किया जाता है।
त्यागने योग्य काल
शुभ विवाह-तिथि चुनते समय कई अशुभ काल टाले जाते हैं। चातुर्मास, अधिक मास व धनुर्मास तो टाले ही जाते हैं; साथ ही जब गुरु या शुक्र अस्त (सूर्य के अत्यंत निकट) हों, तब भी विवाह नहीं किया जाता, क्योंकि ये दोनों ग्रह विवाह के प्रमुख कारक हैं। भद्रा (विष्टि करण) व पंचक जैसे काल भी सूक्ष्मता से देखे जाते हैं। इसके अतिरिक्त वर या वधू की जन्म-राशि से चंद्रमा की प्रतिकूल स्थिति, व कुछ विशेष दोष-काल भी टाले जाते हैं। इतने कारकों के कारण एक वर्ष में विवाह के लिए सीमित शुभ तिथियाँ ही उपलब्ध होती हैं, जिन्हें प्रायः "विवाह मुहूर्त सूची" के रूप में प्रकाशित किया जाता है।
विवाह लग्न और फेरे
शुभ दिन तय हो जाने के बाद, विवाह के मुख्य कर्म — फेरे व सप्तपदी — का ठीक समय लग्न से निश्चित होता है। लग्न वह राशि है जो उस क्षण पूर्व क्षितिज पर उदित हो रही हो, और यह लगभग हर दो घंटे में बदलती है। शुभ लग्न वह होता है जो विवाह के अनुकूल हो, जिसका स्वामी बलवान हो, और जिसमें कोई अशुभ ग्रह पीड़ा न दे रहा हो। कई परंपराओं में अभिजित मुहूर्त या गोधूलि वेला (संध्या) को भी विवाह हेतु शुभ माना जाता है। यह सूक्ष्म लग्न-गणना पंडित द्वारा की जाती है; यह पृष्ठ व प्लानर आपको दिन के चौघड़िया व राहु काल की व्यावहारिक जानकारी देते हैं, ताकि आप संभावित तिथियों को समझ सकें।
पंडित से पुष्टि क्यों आवश्यक है
ऊपर वर्णित सभी विचार — मास, नक्षत्र, तिथि, गुण मिलान, मंगल दोष, अस्त व लग्न — इतने परस्पर जुड़े व सूक्ष्म हैं कि इनका समग्र निर्णय केवल एक अनुभवी पंडित या ज्योतिषी ही ले सकता है, जो दोनों की पूर्ण कुंडलियाँ व क्षेत्रीय परंपरा को ध्यान में रखे। यह पृष्ठ एक सामान्य मार्गदर्शन है, व्यक्तिगत मुहूर्त नहीं। अतः किसी भी संभावित विवाह-तिथि को अंतिम रूप देने से पूर्व योग्य पंडित से पुष्टि अवश्य करें। किसी शॉर्टलिस्ट की गई तिथि पर उस शहर का चौघड़िया व राहु काल जाँचने के लिए ऊपर मुहूर्त प्लानर का उपयोग करें, और शुभ नक्षत्रों को समझने के लिए 27 नक्षत्र देखें।
विवाह के प्रमुख कर्म और उनका समय
हिंदू विवाह अनेक कर्मों की एक सुंदर श्रृंखला है, और प्रत्येक का अपना शुभ समय होता है। विवाह-पूर्व के कर्मों में सगाई (वाग्दान), हल्दी, मेहंदी व गणेश पूजा आते हैं, जो प्रायः विवाह से कुछ दिन पूर्व शुभ मुहूर्त में किए जाते हैं। मुख्य विवाह-दिवस पर वर-आगमन (बारात), कन्यादान, पाणिग्रहण, फेरे (सप्तपदी) व सिंदूरदान होते हैं — इनमें फेरे व सप्तपदी सबसे महत्वपूर्ण हैं, क्योंकि सात फेरों के साथ ही विवाह पूर्ण माना जाता है, अतः इनका ठीक समय शुभ लग्न में निश्चित किया जाता है। विवाह के पश्चात विदाई व गृह प्रवेश (नववधू का ससुराल में प्रवेश) भी शुभ मुहूर्त में किए जाते हैं। इस प्रकार पूरा विवाह-समारोह समय की एक सुविचारित लय में बँधा होता है, जहाँ हर कर्म अपने शुभ क्षण में संपन्न होता है।
क्षेत्रीय विवाह-परंपराएँ
विवाह मुहूर्त की परंपराएँ क्षेत्र अनुसार भिन्न हैं। उत्तर भारत में रात्रि-विवाह (लग्न प्रायः रात में) प्रचलित है, जबकि दक्षिण भारत में प्रातःकालीन विवाह (ब्रह्म मुहूर्त या प्रातः के शुभ लग्न में) अधिक प्रचलित है। महाराष्ट्र में दोपहर के मुहूर्त भी सामान्य हैं। बंगाली विवाह में संध्या व रात्रि के लग्न प्रमुख हैं, व अपनी विशिष्ट रस्में हैं। दक्षिण में नक्षत्र-आधारित गणना विशेष रूप से सूक्ष्म होती है, जबकि उत्तर में तिथि व लग्न पर अधिक बल रहता है। इन विविधताओं के बीच मूल सिद्धांत समान है — शुभ मास, नक्षत्र, तिथि व लग्न का मेल, व दोनों कुंडलियों का मिलान। अपनी क्षेत्रीय परंपरा के अनुसार पंडित से मुहूर्त निश्चित करना सदा उत्तम है।
व्यावहारिक रूप से मुहूर्त-तिथि चुनना
जब पंडित कुछ शुभ विवाह-तिथियाँ सुझाते हैं, तो उनमें से अंतिम चयन प्रायः व्यावहारिक कारकों पर भी निर्भर करता है — मेहमानों की सुविधा, स्थल की उपलब्धता, ऋतु व मौसम, व दोनों परिवारों की सहमति। परंपरा शुभ तिथियों की एक सूची देती है, जिनमें से परिवार अपनी सुविधा अनुसार चुन सकते हैं। यही कारण है कि विवाह-मौसम में कुछ विशेष शुभ तिथियों पर अत्यधिक विवाह होते हैं, जिससे स्थल व सेवाएँ पहले से बुक हो जाती हैं। अतः विवाह की योजना बनाते समय शुभ तिथियों को पहले से जान लेना व्यावहारिक रूप से भी लाभकारी है। किसी संभावित तिथि का चौघड़िया व राहु काल मुहूर्त प्लानर से जाँचें।
आधुनिक विवाह और परंपरा
आज के विवाह प्रायः परंपरा व आधुनिकता का सुंदर मेल होते हैं। कई दंपति व परिवार शुभ मुहूर्त की परंपरा निभाते हुए भी आधुनिक स्थल, शैली व व्यवस्था अपनाते हैं। परंपरा मुख्य कर्मों (फेरे, सप्तपदी) के लिए शुभ लग्न पर बल देती है, जबकि शेष समारोह की व्यवस्था परिवार की पसंद पर निर्भर करती है। यही लचीलापन इस परंपरा को आज भी प्रासंगिक बनाता है — यह प्राचीन शुभता को समकालीन जीवन से जोड़ती है। महत्वपूर्ण यह है कि विवाह के मूल, पवित्र कर्म एक शुभ, सुविचारित क्षण में संपन्न हों, ताकि नए दांपत्य को एक मंगल आरंभ मिले।
विवाह मुहूर्त के बारे में सामान्य प्रश्न
क्या विवाह हेतु गुण मिलान अनिवार्य है? यह अत्यधिक अनुशंसित परंपरा है; अधिकांश परिवार इसे कराते हैं, पर अंतिम निर्णय परिवार का है। यदि गुण कम मिलें तो? केवल अंक ही सब कुछ नहीं — दोष-परिहार व अन्य योग भी देखे जाते हैं; योग्य ज्योतिषी से समग्र विश्लेषण कराएँ। क्या मांगलिक व्यक्ति का विवाह गैर-मांगलिक से हो सकता है? यह एक सूक्ष्म विषय है जिस पर विशेषज्ञ की राय आवश्यक है; कई परिहार-योग होते हैं। चातुर्मास में विवाह क्यों नहीं? क्योंकि इस काल में विष्णु शयन करते हैं; देवुत्थानी एकादशी के बाद विवाह-ऋतु पुनः आरंभ होती है। अंतिम विवाह मुहूर्त सदा योग्य पंडित से, दोनों कुंडलियों को देखते हुए, निश्चित करें।
संस्कार के रूप में विवाह का महत्व
हिंदू दर्शन में विवाह केवल दो व्यक्तियों का मिलन नहीं, बल्कि दो परिवारों, दो परंपराओं व दो आत्माओं का पवित्र बंधन है। इसे सोलह संस्कारों में सर्वोच्च माना जाता है, क्योंकि यह गृहस्थ आश्रम का द्वार खोलता है — वह जीवन-चरण जिसमें व्यक्ति परिवार, समाज व धर्म के प्रति अपने कर्तव्यों का निर्वाह करता है। विवाह के सात फेरे सात वचनों का प्रतीक हैं, जिनमें दंपति परस्पर प्रेम, निष्ठा, सहयोग व साझा जीवन का संकल्प लेते हैं। यही गहन आध्यात्मिक व सामाजिक महत्व विवाह के मुहूर्त को इतना महत्वपूर्ण बनाता है — क्योंकि एक शुभ आरंभ इस जीवनभर के पवित्र बंधन को मंगलमय बनाता है। इसीलिए परंपरा इसे इतनी सावधानी, श्रद्धा व सूक्ष्म गणना से करती है।
अग्नि, मंडप और शुभ प्रतीक
हिंदू विवाह का केंद्र अग्नि है, जो साक्षी व पवित्रता का प्रतीक है — सात फेरे अग्नि के चारों ओर लिए जाते हैं, और अग्नि को साक्षी मानकर वचन दिए जाते हैं। विवाह मंडप (वेदी) में संपन्न होता है, जिसे शुभ प्रतीकों — कलश, आम-पत्ते, नारियल, स्वस्तिक व रंगोली — से सजाया जाता है। इन सबका अपना आध्यात्मिक अर्थ है: कलश समृद्धि, नारियल शुभता, आम-पत्ते वृद्धि। मंगलसूत्र, सिंदूर व मेहंदी सौभाग्य के प्रतीक हैं। इन प्रतीकों व अग्नि की उपस्थिति में, शुभ लग्न में लिए गए वचन विवाह को केवल एक सामाजिक अनुबंध नहीं, बल्कि एक पवित्र, दैवीय बंधन बना देते हैं।
व्यवहार में कुंडली मिलान
व्यवहार में कुंडली मिलान एक चरणबद्ध प्रक्रिया है। पहले दोनों की जन्म-कुंडलियाँ बनाई जाती हैं (जन्म तिथि, समय व स्थान से)। फिर अष्टकूट गुण मिलान से 36 में से अंक निकाले जाते हैं। साथ ही मंगल दोष, नाड़ी दोष व भकूट दोष की जाँच होती है, व इनके परिहार-योग देखे जाते हैं। इसके अतिरिक्त दोनों की दशा-स्थिति, ग्रहों की परस्पर दृष्टि, व दीर्घायु व संतान-योग भी देखे जाते हैं। यह समग्र विश्लेषण केवल अंकों से आगे जाता है — यही कारण है कि दो जोड़ों के समान गुण-अंक होने पर भी उनका मिलान भिन्न हो सकता है। इसीलिए एक अनुभवी ज्योतिषी का समग्र मूल्यांकन आवश्यक है, जो अपना जन्म नक्षत्र जानने के लिए जन्म नक्षत्र कैलकुलेटर से आरंभ कर सकता है।
विवाह-मौसम और लोकप्रिय तिथियाँ
भारत में विवाह प्रायः कुछ निश्चित मौसमों में केंद्रित होते हैं, क्योंकि शुभ मास सीमित हैं। मुख्य विवाह-मौसम नवंबर से जुलाई तक (चातुर्मास को छोड़कर) फैला है, जिसमें माघ-फाल्गुन (जनवरी-मार्च) व वैशाख-ज्येष्ठ (अप्रैल-जून) सर्वाधिक लोकप्रिय हैं। देवुत्थानी एकादशी (कार्तिक, नवंबर) के बाद विवाह-मौसम पुनः आरंभ होता है, व इसके आसपास अनेक विवाह होते हैं। इन शुभ तिथियों पर स्थल, पंडित व सेवाएँ पहले से बुक हो जाती हैं, अतः योजना पहले से बनाना उत्तम है। आगामी शुभ तिथियों की योजना के लिए त्योहार कैलेंडर व मुहूर्त प्लानर सहायक हैं।
संक्षेप में
विवाह मुहूर्त पंचांग के अनेक कारकों — शुभ मास, नक्षत्र, तिथि, वार, योग व लग्न — तथा दोनों कुंडलियों के मिलान का सूक्ष्म मेल है। यह पृष्ठ इसके प्रमुख विचारों का परिचय देता है, पर यह एक सामान्य मार्गदर्शन है — अंतिम विवाह मुहूर्त सदा योग्य पंडित से, दोनों कुंडलियों को देखते हुए, निश्चित करें। किसी संभावित तिथि का चौघड़िया व राहु काल मुहूर्त प्लानर से जाँचें, शुभ नक्षत्रों के लिए 27 नक्षत्र देखें, व मूल सिद्धांत के लिए पंचांग गाइड पढ़ें।
विवाह-पूर्व व विवाह-पश्चात के मुहूर्त
विवाह केवल एक दिन का आयोजन नहीं, बल्कि अनेक शुभ कर्मों की श्रृंखला है, जिनमें से कई के अपने मुहूर्त होते हैं। विवाह-पूर्व में सगाई/रोका (वाग्दान) एक शुभ तिथि में किया जाता है, जो दोनों परिवारों के बंधन की औपचारिक घोषणा है। तिलक, हल्दी व मेहंदी की रस्में भी शुभ समय में की जाती हैं। विवाह के पश्चात नववधू का गृह प्रवेश (ससुराल में प्रथम प्रवेश) व कुछ परंपराओं में पग-फेरा (मायके की प्रथम वापसी) भी शुभ मुहूर्त में होते हैं। इस प्रकार पूरा विवाह-प्रसंग समय की एक शुभ लय में बँधा होता है, जहाँ हर कर्म अपने मंगल क्षण में संपन्न होकर नए दांपत्य को आशीर्वाद देता है।
विवाह मुहूर्त — एक सारांश चेक-लिस्ट
विवाह मुहूर्त चुनने के मुख्य चरण संक्षेप में: (1) शुभ मास चुनें (माघ, फाल्गुन, वैशाख, ज्येष्ठ आदि; चातुर्मास, अधिक मास व धनुर्मास टालें)। (2) शुभ नक्षत्र व तिथि देखें। (3) वर-वधू का गुण मिलान कराएँ व दोष-परिहार जाँचें। (4) गुरु व शुक्र के अस्त न होने की पुष्टि करें। (5) उस दिन के भीतर शुभ लग्न व चौघड़िया में फेरों का समय तय करें, राहु काल से बचते हुए। (6) अंतिम मुहूर्त योग्य पंडित से, दोनों कुंडलियों को देखते हुए, निश्चित करें। यह क्रम दर्शाता है कि विवाह मुहूर्त एक सुविचारित, बहु-स्तरीय प्रक्रिया है, जिसका उद्देश्य नए जीवन को सर्वोत्तम आरंभ देना है।
धैर्य और श्रद्धा का महत्व
विवाह मुहूर्त की परंपरा अंततः धैर्य व श्रद्धा की परंपरा है। शुभ तिथि की प्रतीक्षा, कुंडली मिलान की सावधानी, व हर कर्म को उसके शुभ क्षण में करने की सूक्ष्मता — ये सब इस विश्वास से उपजते हैं कि जीवन के इस सबसे महत्वपूर्ण बंधन को सर्वोत्तम, मंगल आरंभ मिलना चाहिए। यह परंपरा दंपति व परिवार को एक साथ लाती है, विवाह को केवल एक आयोजन नहीं बल्कि एक पवित्र संस्कार बनाती है, और नए जीवन को आशा, आशीर्वाद व शुभ-संकल्प से भर देती है। अपने विवाह की योजना बनाते समय, इन विचारों को समझकर व योग्य पंडित के मार्गदर्शन में, आप इस सुंदर परंपरा का पूर्ण लाभ ले सकते हैं।
विवाह मुहूर्त और ज्योतिष का समग्र दृष्टिकोण
विवाह मुहूर्त वैदिक ज्योतिष के दो पक्षों — मुहूर्त (समय-चयन) व कुंडली-विश्लेषण — का सुंदर संगम है। जहाँ मुहूर्त शुभ दिन व लग्न चुनता है, वहीं कुंडली-मिलान वर-वधू की परस्पर अनुकूलता देखता है। दोनों मिलकर एक ऐसा आरंभ बनाते हैं जो न केवल समय की दृष्टि से शुभ हो, बल्कि दोनों व्यक्तियों की प्रकृति के अनुरूप भी। यही समग्रता विवाह मुहूर्त को इतना महत्वपूर्ण बनाती है। अपनी व अपने संभावित जीवनसाथी की जन्म-कुंडली व नक्षत्र जानने के लिए जन्म नक्षत्र कैलकुलेटर से आरंभ करें, व शुभ नक्षत्रों को समझने के लिए 27 नक्षत्र देखें। अंतिम निर्णय सदा योग्य पंडित के मार्गदर्शन में लें।
सामान्य प्रश्न
विवाह मुहूर्त कैसे चुना जाता है?
विवाह मुहूर्त शुभ नक्षत्रों, तिथियों, वारों व मासों से चुना जाता है, अशुभ काल को टालकर। सटीक तिथियाँ वर-वधू की कुंडलियों पर निर्भर करती हैं।
क्या मैं कोई भी शुभ-सा दिन चुन सकता हूँ?
सामान्य मुहूर्त शुभ काल बताता है, किंतु विवाह व गृह प्रवेश के लिए परिवार की कुंडलियाँ व क्षेत्रीय परंपरा महत्वपूर्ण हैं। अंतिम मुहूर्त सदा योग्य पंडित से निश्चित करें।
कौन-से मास शुभ हैं?
शुभ नक्षत्रों में रोहिणी, मृगशिरा, मघा, उत्तराफाल्गुनी, हस्त, स्वाति, अनुराधा, मूल, उत्तराषाढ़ा, उत्तराभाद्रपदा व रेवती हैं। शुभ तिथियाँ द्वितीया, तृतीया, पंचमी, सप्तमी, एकादशी व त्रयोदशी हैं।
कौन-से काल टाले जाते हैं?
विवाह चातुर्मास (जब विष्णु शयन करते हैं, लगभग आषाढ़ से कार्तिक) में, तथा जब गुरु या शुक्र अस्त हों, टाला जाता है।
क्या पंडित आवश्यक है?
हाँ — यह पृष्ठ सामान्य मार्गदर्शन है; अंतिम मुहूर्त कुंडलियों व क्षेत्रीय परंपरा को देखते हुए योग्य पंडित से निश्चित करें।