देवशयनी एकादशी
देवशयनी एकादशी आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी (प्रायः June–July) को पड़ती है। इस दिन से विवाह, यज्ञोपवीत व गृहप्रवेश जैसे शुभ कार्य चार मास तक रुक जाते हैं और प्रबोधिनी एकादशी पर विष्णु के 'जागने' पर पुनः आरंभ होते हैं। यह बढ़ी हुई भक्ति, संकल्प व सादगी का काल है।
एक दृष्टि में
| तिथि | आषाढ़ शुक्ल पक्ष एकादशी |
| सामान्य ऋतु | June–July |
| अधिष्ठाता देव | विष्णु |
देवशयनी एकादशी की कथा
देवशयनी (हरिशयनी या पद्मा) एकादशी चातुर्मास का आरंभ करती है — वे चार पवित्र मास जब विष्णु क्षीरसागर में शेषनाग पर योगनिद्रा में लीन कहे जाते हैं। इसकी कथा भविष्य व पद्म पुराणों में राजा मान्धाता तथा धर्म से दूर हुए अकाल के निवारण से जुड़ी है।
महत्व
इस दिन से विवाह, यज्ञोपवीत व गृहप्रवेश जैसे शुभ कार्य चार मास तक रुक जाते हैं और प्रबोधिनी एकादशी पर विष्णु के 'जागने' पर पुनः आरंभ होते हैं। यह बढ़ी हुई भक्ति, संकल्प व सादगी का काल है। वर्ष की चौबीस एकादशियों में एक होने के कारण यह भगवान विष्णु को समर्पित ग्यारहवीं एकादशी तिथि का दिन है, जो प्रतिवर्ष आषाढ़ के शुक्ल पक्ष में आता है।
व्रती चातुर्मास के नियम आरंभ करते हैं, विष्णु की पूजा करते हैं, और अनेक चार मास हेतु विशेष संयम (किसी भोजन या आदत का त्याग) लेते हैं।
एकादशी व्रत कैसे रखा जाता है
चौबीसों एकादशियों में मूल विधि प्रायः एक-सी है। व्रत दशमी (दसवें दिन) को हल्के, अन्न-रहित भोजन के बाद आरंभ होकर एकादशी भर चलता है। व्रती प्रातः उठकर स्नान करते हैं, संकल्प लेते हैं, फिर तुलसीदल, दीप, धूप व नैवेद्य से भगवान विष्णु की पूजा करते हैं, और दिन प्रार्थना, जप, विष्णु सहस्रनाम या उस दिन की कथा-श्रवण, व दान में बिताते हैं। अनेक रात्रि-जागरण करते हैं। व्रत का पारण अगले दिन द्वादशी को, निर्धारित समय में विष्णु को भोग अर्पित करने के बाद किया जाता है।
परंपरा में एकादशी को अन्न, चावल, दाल व फलियाँ त्याग दी जाती हैं। व्रती अपनी क्षमता के अनुसार चुनते हैं: बिना जल के पूर्ण निर्जल व्रत; फल, दूध व विहित भोज्य का फलाहार व्रत; या केवल एक अन्न-रहित भोजन। वृद्ध, रोगी, गर्भवती स्त्रियों व बच्चों को कोमल व्रत की सलाह है। दिन का भाव — संयम, भक्ति व दान — कठोरता से अधिक महत्वपूर्ण है।
यह पृष्ठ देवशयनी एकादशी के पारंपरिक महत्व व विधि का वर्णन करता है; यह पंडित के मार्गदर्शन का विकल्प नहीं है। सटीक तिथि व व्रत/पारण समय अपने स्थानीय पंचांग से पुष्टि करें।
सामान्य प्रश्न
देवशयनी एकादशी कब होती है?
देवशयनी एकादशी आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी (ग्यारहवीं तिथि) को होती है, प्रायः June–July में। ग्रेगोरियन तिथि हर वर्ष बदलती है — इस वर्ष की तिथि हेतु आगामी एकादशी तिथियाँ या अपना स्थानीय पंचांग देखें।
देवशयनी एकादशी का महत्व क्या है?
इस दिन से विवाह, यज्ञोपवीत व गृहप्रवेश जैसे शुभ कार्य चार मास तक रुक जाते हैं और प्रबोधिनी एकादशी पर विष्णु के 'जागने' पर पुनः आरंभ होते हैं। यह बढ़ी हुई भक्ति, संकल्प व सादगी का काल है।
देवशयनी एकादशी की कथा क्या है?
देवशयनी (हरिशयनी या पद्मा) एकादशी चातुर्मास का आरंभ करती है — वे चार पवित्र मास जब विष्णु क्षीरसागर में शेषनाग पर योगनिद्रा में लीन कहे जाते हैं। इसकी कथा भविष्य व पद्म पुराणों में राजा मान्धाता तथा धर्म से दूर हुए अकाल के निवारण से जुड़ी है।।
एकादशी को क्या खा सकते हैं?
अन्न, चावल, दाल व फलियाँ त्यागी जाती हैं। अनेक लोग फल, दूध व मेवे का फलाहार व्रत रखते हैं; कठोरतम निर्जल (बिना जल) व्रत रखते हैं। अपने स्वास्थ्य अनुसार चुनें।
कठोर एकादशी व्रत किसे नहीं रखना चाहिए?
वृद्ध, रोगी, गर्भवती स्त्रियों व बच्चों को निर्जल के बजाय कोमल फलाहार व्रत की सलाह है। भक्ति व संयम कठोरता से अधिक महत्वपूर्ण हैं।
पारण (व्रत तोड़ना) कब होता है?
व्रत अगले दिन द्वादशी को, निर्धारित पारण-काल में विष्णु को भोग अर्पित करने के बाद तोड़ा जाता है। पारण-समय स्थान अनुसार बदलता है — अपने स्थानीय पंचांग से पुष्टि करें।